Friday, May 04, 2018

हाथ की गाथा

कभी कभी इन हाथों को देख
मन यूँ ही मुसकाता है
ना कोई नज़ाकत ना कोई हुनर
फिर क्यूँ मुझे यह भाता है

ना शिल्पकार की शिल्पी इनमें
ना चित्रकार की छवि ही है
लेखक की कहानी तो छोड़ो
ना गीतकार की मुर्रकी है

पर हाँ नींद में ओझल बच्चों के यह
सर पर जब रखे जाते हैं
प्यार, हिफ़ाज़त, ध्यान, साथ
सभी के वादें जताते हैं

दिन प्रतिदिन यह प्रेम सहित
घर का पोषण करते हैं
छोटे छोटे दुखते हाथ पैरों को
रात जग सुकून की नींद सुलाते हैं

ममता का आक्रोश है इनमें
उत्तेजना की लो भी है
सही के लिए उठ खड़े हों
ऐसी इनमें क्षमता भी है

प्रेमी के स्पर्श की छाप
अपनी पहचान में समेटे हैं
कभी अगर प्रेम दस्तक दे तो
यह पहचान पत्र बन जाते हैं

लोरी के संग झूलें हैं यह
कार्यस्थल में जगह बनाएँ हैं
कभी चूड़ियों के खनक में
श्रीनगर  रस भी जताएँ हैं

किसी एक किरदार के नहीं
यह बहुरूपी मेरे हाथ ही हैं
कैसे ना इनसे प्रेम करूँ मैं
हर उपलब्धि को सम्भव करने में
यह जो मेरे साथ ही हैं

Friday, March 23, 2018

रंगमंच

कैसा न्यारा कैसा अनूठा 
है नाता रंगमंच से रंगकारी का
वो रुझाव वो खिंचाव 
जो रहे परस्पर नर और नारी का 
कभी गर्वित माता के भाँति 
निष्ठावादी को सराहती है
कभी शिक्षक बनके वो 
अहंकारी को गिराती है 
कलाकार का मंदिर है मंच
वही उसका इष्ट भी है
वही उसकी पहचान बने है 
कभी बने उसकी पृष्ठभूमि है 
ऐसी करुणा की गाथा
हमने सुन भी रखी है 
जीवन की साँसों का लय भी 
कलाकार ने मंच की आँचल में ही तोड़ी है 
आशा का स्तोत्र है मंच
प्रेमी, माता, प्रभु यही
एक बार जीवन मंच से जो जुड़े 
आरम्भ भी वही 
अंत भी वही 

Friday, March 16, 2018

My diamond

Once i was sharp and i was bright
Someone broke me into shards of light
Each shard then burnt just as bright
Each shard became pinpoints of light

Sunday, August 27, 2017

maloom hai mujhe

बाक़ी के पास तो वक़्त नहीं
इतनी ख़बर है मुझे
तुम्हारे पास आई हूँ
पता है
आज भी हर दिन में
कुछ पल मेरे नाम कर रखे हैं तुमने 

mil jaao agar kabhi

कभी अगर तुम मुझसे मिल जाओ
तो ज़र्रा नवाज़ी की उम्मीद तो ना रखोगे मुझसे
में मसरूफ होंगी
तुम्हारे हर ज़र्रे की नवाज़िश में 

Wednesday, August 23, 2017

duvidha

दीया में बैठी बाती हूँ
सोच रही हूँ
लौ बनूँ कि नहीं 

Monday, July 03, 2017

zinda hain abh bhi

ज़िन्दगी सूखे पत्तों के मानिंद है
भूरा, भुना, चुरमुराय सा
सिर्फ ख्वाहिश की ज़िद से शाख से लगा हुआ
यूँ तो कोई हरारत, कोई हरकत नहीं
पर माज़ी की हवा जब चलती है
तो शाखों से गिर,
हाल के क़दमों के नीचे ही
उनकी ख़ामोशी टूटती है 

faislon ka kya hai

दिमाग़ के फैसलों का
दिल के रवैय्ये पर कहाँ कोई इख़्तियार है
फ़ैसला तो हमने भी किया था
तुम्हे याद न करने का
तुम्हारा नाम तक न लेने का
यह जो भूल बैठे थे 
कि दिल की धड़कनों का लेय ही
तुम्हारा नाम है 

Tuesday, February 14, 2017

wahin...

नज़र हट गयी
ज़माने गुज़र गए
हवा का रुख़ भी बदल गया
अब तो अपना वोह उम्र भी
किसी और की कहानी लगती है
पर फिर भी
जब कुछ पल
इस ज़िन्दगी से नोच निकालती हूँ
तो मन की आँखों में
तुम्ही  को पाती हूँ
अब भी महसूस करती हूँ
तुम्हारी हाथों के स्पर्श को
अपने शरीर के छाप में
तुम्हारी आँखों की उस नज़र को
देख सकती हूँ अपने मन में
तुम्हारी आवाज़ के लय में
मेरे नाम की स्मृति
गुदगुदाता है मेरे अंतसतः को
एक बार
बस एक बार
फिर से याद दिला दो
उस हसीं का कारण
फिर कर दो बेदम
फिर उखाड़ दो मेरी साँसें
फिर समा लो मुझे अपनी आवश्यकता में
मेरी याद ने तुमको ऐसा अपनाया है
की तुम्हारी ही होके रह गयी हूँ
फ़र्क बस इतना है
कि में भूल सकती नहीं
और तुम जानते भी नहीं 

to love as it is meant to be...

To love with abandon. That is to say, to abandon oneself to love the other. so that all that remains, is the other, with the YOU becoming an amorphous thought, flowing in and out. to love with a clawing hunger, which makes the stomach turn into itself and the heart plummet into the depths of longing. the fumes of passion rising to the head and making it light headed. the desire to be owned clawing the mundaneness of existence and propriety. to be utterly and shamelessly dependent and needy. and to be held for that. is to love as it meant to be. 

How do i know i live?

it has been a while since words crystallised my thoughts....it is not like i have not been thinking...no, anything but. my head is abuzz with the zipping around of my thoughts, banging into one another. not crashing and destroying each other, but providing each other with that impetus, that push, which propels them into greater speed and higher frequency.

it is not like life is empty and therefore thoughts abound. each day rushes by, the sound of it zipping by almost throwing me off balance. yet, sometimes, life just swirls around me in its hurry, while i seem to be rooted at one spot. a hunger, a deep gnawing kind of hunger is consuming me these days. a desperation is eating into my innards, making me feel almost faint with the vacuum that it creates. a hunger for passion, for an all consuming ownership, to be occupied in thought and in feeling. nothing consumes me lately. nothing has. and i dont seem to be consuming anyone. A life where something does not consume me, or i do not consume someone, is a life that is like a placid body of water. no ripple. no movement. no sign of life. there is a madness that is my own, that i own, that needs to own me. life needs to make me breathless. it needs to make my heart skip a beat, it needs to roughly pull me into its arms and own me. rough me up. hold me close. disrupt my breathing. quicken my heartbeat.

make me feel alive.