लो फिर याद आ गई
अभी तो जागना शुरू हुए थे
अभी तो नींद टूटी थी
अभी तो हिम्मत जुटा पाए थे
की कहें की सरकार झूठी थी
भूल गए थे आवाज़ उठाना
ज़ंक लगी थी शब्दों में
देख रहे थे दिन प्रतिदिन
देश का विनाश
बैठे अपने कमरों में
तुमने हमको फिर से जगाया
हमको अपनी नींद से उठाया
सिखाया
कि हर लड़ाई हम सब की है
आज की है और कल की है
अपने नटखट अडिग भाव से
हँसते गाते लाठी की बौछारों में
तुमने हमको यह भी दिखाया
क्या ताक़त है ज़िद्दी बच्चों में
डरते डरते हमनें भी फिर
कदम बढ़ाया उन रास्तों पर
जिसपे कभी हम भी चले थे
फिर बैठ गए थे डरकर, निराश होकर
फिर से ज्वाला धधक उठी थी
उन ठंडी चिंगारियों में
वही जोश और वही ज़िद्द फिर पाया
जीवन के सभी गतिविधियों में
सफलता मिली। पर क्या काफ़ी है?
इतना ही चाहिए क्या देश में?
अभी तो दूरी नज़र आती है
बदलाव के परिवेश में।
अभी तो एक जुट हुए थे
धरम जाति सब भूल के
अभी तो सेना तैयार हुई थी
खेलने अंगारों के फूल से
तुमने जो ताक़त दिखलायी
उसे नहीं तुम खोने दो
भी तो लपटें धधक रही हैं
उन्हें ना ठंडा होने दो
अब याद दिलाया हम में भी है
एक भूले बिसरे क्रांतिकारी का दिल
हठी और शोख़ी तुमसे सीखें
तो साथ पायेंगे हम मंजिल।
- Smita M Rajaram


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